मारवाड़ क्षेत्र के लोक नृत्य | maaravaad kshetr ke lok nrty

मारवाड़ क्षेत्र के लोक नृत्य (maaravaad kshetr ke lok nrty) के इस लेख में मारवाड़ क्षेत्र के प्रमुख लोक नृत्यों का विस्तार पूर्वक वर्णन किया गय है, यह लेख भर्ती परीक्षाओ की तैयारी कर रहे विद्यार्थीयो के लिए अति महत्वपूर्ण है, इस लेख में घुडला नृत्य, झांझी नृत्य, ढोल नृत्य, अग्नि नृत्य आदि का विस्तार पूर्वक वर्णन किया गया है| भर्ती परीक्षाओ की तैयारी कर रहे विद्यार्थी एक बार इस लेख को जरुर पढ़ लेना चाहिए, यह पोस्ट उनकी तैयारी को और अधिक मजबूती प्रदान करेगी|

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घुड़ला नृत्य

  • घुड़ला नृत्य विशेष रूप से जोधपुर जिले में किया जाता है।
  • यह नृत्य युवतियों के द्वारा किया जाता है।
  • घुड़ला नृत्य में स्त्रिया सुदर श्रृंगार करके गोलाकार पथ पर नृत्य करती है।
  • यह नृत्य करते समय महिलाओं के सिर पर छिद्रित मटके रखे होते है। जिनमें जलता हुआ दीपक रखा जाता है। इस मटके को ही घुड़ला कहते है। इसमें चाल मंद व मादक होती है व घुड़ले को नाजुकता से सभाला जाता है जो दर्शनीय है।
  • घुड़ला नृत्य से एक कथा जुड़ी हुई है-एक बार मारवाड़ के पीपाड़ा नामक स्थान पर स्त्रिया तालाब पर गौरी पूजन कर रही थी तभी अजमेर का सूबेदार मल्लू खाँ इनका हरण करके ले जाता है। जोधपुर नरेश सातल देव ने इनका पीछा किया। इनका भयंकर युद्ध हुआ जिसमें मल्लू खाँ के सेनापति घुडले का सिर छिद्रित कर सातल देव द्वारा लाया गया तब से यह नृत्य किया जाता है
  • शीतला अष्टमी (चैत्र कष्णा -8) पर घुडले का त्यौहार मनाया जाता है

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झाँझी नृत्य

  • यह नृत्य मारवाड़ क्षेत्र में महिलाओं के द्वारा किया जाता है।
  • झाँझी नृत्य के अन्तर्गत छोटे मटकों मे छीद्र करके महिलाएं समूह में उनको धारण करके यह नृत्य करती है।

ढोल नृत्य

  • ढोल नृत्य जालौर का प्रमुख नृत्य है।
  • दोल नृत्य विवाह के अवसर पर किया जाता है।
  • ढोल नृत्य केवल पुरूषों के द्वारा किया जाने वाला नृत्य है।
  • ढोल नृत्य माली, दोली, सरगड़ा व भील जाति के लोगों द्वारा किया जाता है।
  • इस नृत्य को पेशेवर नृत्य भी कहा जाता है।
  • ढोल नृत्य को प्रकाश में लाने का श्रेय भूतपूर्व मुख्यमंत्री श्री जयनारायण व्यास को है।
  • नृत्य में एक साथ चार या पाँच ढोल बजाए जाते हैं।
  • ढोल का मुखिया थाकना शैली में बजाना शुरू करता है। ज्योंही थाकना समाप्त होता है। नृत्यकारों के समूह में कोई मुँह में तलवार लेकर, कोई हाथ में डण्डे लेकर कोई भुजाओं में रूमाल लटका कर लयबद्ध अंग संचालन करते है।

अग्नि नृत्य

  • अग्नि नृत्य जसनाथी सिद्धों का प्रसिद्ध नृत्य है।
  • जसनाथी सम्प्रदाय के मतानुयायी जाट सिद्ध कबीले के लोग होते है।
  • अग्नि नृत्य का उद्गम कतरियासर (बीकानेर) में हुआ है।
  • कतरियासर में जसनाथ जी की जन्म स्थली है।
  • जसनाथी सिद्धों के द्वारा रात्रि जागरण में अग्नि नृत्य किया जाता है।
  • अग्नि नृत्य शुरू करने से पूर्व कई मण लकड़ियों को जला कर 7 फुट लम्बा, 6 फुट चौड़ा, 3 फुट ऊँचा अग्नि का देर तैयार किया जाता है। धूणे के चारों ओर पानी का छिड़काव किया जाता है। तीन शब्द जसनाथियों के व चौथा शब्द (नाचणियों) गाया जाता है।
  • अग्नि नृत्य को सिद्ध कस्तम जी का कहकर प्रारम्भ किया जाता है।
  • जसनाथी सम्प्रदाय के सिद्ध लोग जसनाथ जी के गीत गाते हुए गुरू की आज्ञा से ‘ फतै-फतै ‘ करते हुए अग्नि नृत्य में प्रवेश करते है।
  • तरियासर, मामलू, डिकमदेसर आदि अग्नि नृतकों के प्रसिद्ध गाँव है।
  • अग्नि नृत्य को संरक्षण देने में बीकानेर के स्वर्गीय महाराजा गंगासिंह का बहुत बड़ा योगदान है।
  • इसमें नृत्यकार अंगारों से मतीरा फोड़ना-हल जोतना आदि क्रियायें सम्पन्न करता है।
  • अग्नि नृत्य में नगाड़ा नामक वाद्य यंत्र बजाया जाता है।
  • अग्नि नृत्य मुखत्या पुरुष प्रधान नृत्य है|

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