बाल विकास को प्रभावित करने वाले कारक | Psychology Notes

दोस्तों, बहुत से विद्यार्थी bal vikas ko prabhavit karne wale karak बाल विकास को प्रभावित करने वाले कारक के बारे में सर्च करते है | परन्तु उन्हें परिणाम English में मिलते है | परन्तु वे हिंदी में in Hindi पढना चाहते है |  इस आर्टिकल में मैंने आपको बाल विकास को प्रभावित करने वाले कारक कौन-कौनसे है? के बारे में विस्तार से बताया है | 
 
सभी कारकों को बिन्दुवार विस्तार से वर्णित किया है | जिसे पढ़कर आप अनेक शिक्षक भर्ती परीक्षाओं जैसे REET, CTET, KVS, DSSSB, HTET & UPTET आदि में अच्छे अंक प्राप्त करे सकते है |
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बाल विकास को प्रभावित करने वाले कारक

बाल विकास व अभिवृद्धि को मुख्य रूप से दो कारक वंशानुक्रम व वातावरण विशेष रूप से प्रभावित करते है | जिनका वर्णन आपको निचे बिन्दुवार दिया गया है |

1. वंशानुक्रम संबंधी कारक

शारीरिक रचना (Bodily Construction)-

व्यक्ति के विकास में शारीरिक रचना का विशेष महत्व हुआ करता है। व्यक्ति की शारीरिक सुन्दरता, आकर्षण, स्वास्थ्य आदि तत्व उत्तम व्यक्तित्वका निर्माण करते हैं तथा श्रेष्ठ भावों को जन्म देते हैं।

अन्तःस्रावी ग्रन्थियाँ (Endocrine Glands)-

प्रत्येक व्यक्ति के शरीर में कुछ अन्तःस्रावी ग्रन्थियाँ होती हैं जिससे आन्तरिक स्राव होता है, एक प्रकार का रस निकलता है। इस रस को हारमोन्स (Harmon) भी कहते हैं। यह आन्तरिक स्राव रक्त में मिलकर शरीर के विभिन्न अंगों में पहुँचाता है और सम्बन्धित अंगों की कार्य-प्रणाली को गतिशील रखता है।
प्रमुख अन्त:स्त्रावी ग्रन्थियाँ निम्नलिखित है 
  • गलग्रन्थि (Thyroid Gland) – 
इस ग्रन्थि का व्यक्त्वि पर बहुत बड़ा प्रभाव पड़ता है। यह ग्रन्थि जीभ के मूल में और श्वास नलिका के सामने होती है। इस ग्रन्थि से यदि स्राव अधिक होता है तो व्यक्ति चिन्ता, बेचैनी, तनाव, उत्तेजना आदि का अनुभव करता है और यदि कम होता है तो व्यक्ति थकावट, खिन्नता, मानसिक दुर्बलता आदि का अनुभव करता है। इसलिए व्यक्ति के व्यक्तित्व को समुचित विकास के लिए गल ग्रन्थि की उचित क्रियाशीलता आवश्यक है
  • उपवृक्क ग्रन्थि (Adrenal Gland)-
इस ग्रन्थि से जो स्राव होता है उसे एड्रिनल कहते हैं। इससे व्यक्ति का संवेगात्मक व्यवहार प्रभावित होता है। इस स्राव की कमी व्यक्ति को चिड़चिड़ा, उदास तथा निर्बल बनाती है और अधिकता क्रियाशील, उत्तेजित तथा सशक्त बनाती है।
  • पोष ग्रन्थि (Pituitary Gland)-
यह ग्रन्थि व्यक्ति के मस्तिष्क में स्थित होती है। इस ग्रन्थि की क्रियाशीलता अन्य अन्तःस्रावी ग्रन्थियों के कार्य व्यापार पर नियंत्रण रखती है। इस ग्रन्थि से अधिक स्राव होने पर व्यक्ति आवश्यकता से अधिक लम्बा, झगड़ालू और आक्रमणकारी स्वभाव वाला होता है | इसके विपरीत आवश्यकता से  कम स्राव होने पर व्यक्ति का शारीरिक एवं यौन अंगों (Sex organs) का सम्यक् विकास नहीं हो पाता है। 

स्नायु मण्डल (Nervous System)

जिस व्यक्ति का स्नायु. मण्डल जितना अधिक सुव्यवस्थित होगा उसका व्यक्तित्व उतना ही अधिक विकसित होगा। स्नायु मण्डल के व्यवस्थित होने से मानसिक क्रियायें सुचारु रूप से चलती रहती हैं। मानसिक क्रियाओं द्वारा व्यक्ति का व्यवहार नियंत्रित होता है, और व्यवहार से व्यक्तित्व का परिचय मिलता है। इस प्रकार व्यक्ति के व्यक्तित्व के विकास में स्नायु मण्डल की सुव्यवस्था आवश्यक है।

बुद्धि (Intelligence)-

व्यक्ति के निर्धारण में बुद्धि का प्रभाव उसके व्यक्तित्व पर पड़ता है। तीव्र बुद्धि वाले व्यक्ति का व्यक्तित्व सामान्य अथवा मन्द बुद्धि वाले व्यक्ति के व्यक्तित्व की अपेक्षा भिन्न होता है।
 

2. वातावरणीय कारक

भौगोलिक बातावरण (Geographical environment)-

किसी भी स्थान की प्रकृति एवं जलवायु का प्रभाव वहाँ रहने वाले व्यक्तियों के व्यक्त्वि पर एक बहुत बड़ा प्रभाव डालता है। ठंडी जलवायु वाले देशों के लोग प्रायः वस्थ, सुन्दर, बुद्धिमान, सक्रिय और परिश्रमी होते हैं और गर्म जलवायु वाले देशों के व्यक्ति काले अस्वस्थ, निष्क्रिय आलसी एवं अपेक्षाकृत कम बुद्धिमान होते हैं।

पारिवारिक वातावरण (Family Environment)

  1. माता-पिता का कठोर अनुशासन,
  2. माता- -पिता का पक्षपातपूर्ण व्यवहार
  3. माता-पिता की अत्यधिक ममता
  4. माता- -पिता द्वारा ऊँचे आदर्शों को थोपना
  5. माता-पिता का असंतोषजनक वैवाहिक जीवन
  6. परिवार में स्थान/ जन्म- क्रम
  7. पोषण

विद्यालयी वातावरण (School Environment)

  1. अनुचित पाठ्यक्रम
  2. दोषपूर्ण शिक्षण विधियाँ
  3. दोषपूर्ण परीक्षा प्रणाली
  4. शिक्षक के व्यक्तित्व का प्रभाव
  5. पर्याप्त सुविधाओं का अभाव 
  6. अध्यापकों द्वारा छात्रों की खुली निन्दा
  7. भीड़ भरी कक्षायें

मनोवैज्ञानिक वातावरण (Psychological environment)

  1. प्रारम्भिक आवश्यकतायें, प्रेम-स्नेह सहानुभूति का न मिल पाना
  2. मानसिक आघात
  3. निर्देशन व परामर्श

सामाजिक वातावरण (Social Environment)

व्यक्ति से समाज का निर्माण होता है। जन्म से मृत्यु तक व्यक्ति किसी समाज में रहता है। उस समाज के व्यक्तियों और परिस्थतियों का प्रभाव उस व्यक्ति पर पड़ता रहता है। व्यक्ति के माता-पिता, परिवार, पास-पड़ोस, इष्टमित्र, समूह, विद्यालय आदि का प्रभाव उसके व्यक्तित्व पर पड़ता रहता है। अच्छे सामाजिक वातावरण में व्यवस्थित व्यक्तित्व एवं बुरे सामाजिक वातावरण में विकृत व्यक्तित्व का निर्माण होता है। ऐसे वातावरण में व्यक्ति जो कुछ सीखता है उसका प्रभाव उसके व्यक्तित्व पर पड़ता है।

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