मनोसामाजिक विकास सिद्धांत : एरिक एरिक्सन erikson ka manosamajik vikas sidhant

erikson ka manosamajik vikas sidhant : मनोसामाजिक विकास सिद्धांत क्या है? मनोसामाजिक सिद्धांत के प्रवर्तक कौन है? erikson ka siddhant मनोसामाजिक सिद्धांत में विकास की कितनी अवस्थाएं बतायी गई है?  मनोसामाजिक विकास के संस्थापक कौन हैं?  मनोसामाजिक विकास के संस्थापक कौन हैं? एरिक्सन ने कौन सा सिद्धांत दिया? इन सभी प्रश्नों के उत्तर इस पोस्ट में आपको मिलेंगे |
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मनोसामाजिक विकास का सिद्धांत : एरिक एरिक्सन

एरिक्सन के मनोसामाजिक सिद्धांत से संबधित प्रमुख तथ्य : erikson ka manosamajik vikas sidhant

  • मनोसामाजिक विकास सिद्धांत के प्रवर्तक-इरिक इरिक्सन/ एरिक्सन (Erik Erickson)
  • इरिक्सन नव फ्रायडवादी मनोवैज्ञानिक माने जाते हैं और वे फ्रायड के सिद्धांत का काफी सीमा तक समर्थन करते हैं लेकिन इन्होंने फ्रायड की तरह कामुकता को महत्वपूर्ण नहीं माना।
  • इनके सिद्धांत में व्यक्तिगत (Personal), सांवेगिक (Emotional) तथा सांस्कृतिक (Cultural) या सामाजिक विकास (Social Development) को समन्वित किया गया है|
  • इसे मनोसामाजिक सिद्धांत (Psycho social Theory) कहा जाता है।
  • इस सिद्धांत को कुछ मनोवैज्ञानिकों ने जीवन अवधि विकास का सिद्धांत भी कहा है।
  • इरिक्सन ने अपनी प्रसिद्ध कृति चाइल्ड हुड एण्ड सोसायटी -1963 में यह स्पष्ट किया है कि मनुष्य केवल जैविक और मानसिक प्राणी ही नहीं है, बल्कि वह एक सामाजिक प्राणी भी है। 
  • इरिक्सन ने इस सिद्धांत में पूरे जीवन अवधि (Life Spans) को 8 विभिन्न अवस्थाओं में बांटा है

1. विश्वास बनाम् अविश्वास (Trust vs Mistrust)- 

समय  : शैशवावस्था (जन्म से 18 माह/ 17 वर्ष)
बच्चों को अपने माता पिता को देखकर उचित स्नेह व प्रेम मिलता है, जो उनमें विश्वास (Trust) का भाव विकसित करता है तथा जब माता 1-पिता बच्चों को रोते-बिलखते व चिल्लाते छोड़ जाते हैं, तो उनमें अविश्वास (Mistrust) की भावना विकसित हो जाती है।

2. स्वतंत्रता बनाम् लज्जाशीलता तथा शक/ आत्मनिर्भरता बनाम् लज्जा (Autonomy vs Shame and Doubt )-

समय  : प्रारम्भिक बाल्यावस्था (17 से 3 वर्ष)
इस अवस्था में बालक अपने आप भोजन करना, कपड़े पहनना इत्यादि पर दूसरों पर निर्भर रहना नहीं चाहते। वह स्वतंत्र रूप से कार्य करना चाहते हैं। दूसरी तरफ बहुत सख्त माता-पिता बच्चों को साधारण कार्य करने पर भी डाँटते हैं तथा उनकी क्षमता पर शक करते हैं, जिसके कारण बच्चे अपने अंदर लज्जा अनुभव करते हैं।

3. पहल शक्ति, बनाम् दोषित (Initiative vs Guilt)-

समय  : (3 से 5 वर्ष)
यह बच्चों का प्राक् स्कूली वर्ष (Pre School Years) होता है तथा ये अवधि बालक की पूर्व/ आरम्भिक बाल्यावस्था की होती है। माता-पिता बच्चों को जिंदगी के सभी क्षेत्रों में नये-नये खोज करने की प्रेरणा देते हैं, तो इसे पहल की संज्ञा देते हैं और जब माता-पिता पहल करने पर उनकी आलोचना/ दण्ड देते हैं, तो बच्चों में दोष भाव उत्पन्न हो जाता है।

4. परिश्रम बनाम् हीनता/ उद्यमिता बनाम् हीन भावना (In dustry vs Inferiority)-

समय  : (6 से 12 वर्ष)
इस अवधि को उत्तरबाल्यावस्था भी कहा जाता है। जब बच्चों को पहल से उत्पन्न नई अनुभूतियाँ मिलती है। तब वह अपनी ऊर्जा को नये ज्ञान अर्जित करने में लगाते हैं, इसे परिश्रम की संज्ञा दी गई है |

5. अहम् पहचान बनाम भूमिका संभ्रांति :

समय  : 12 से 18 वर्ष तक
यह किशोरावस्था का काल है |  ऐरिक्सन का पांचवा विकासात्मक चरण है, जिसका अनुभव किशोरावस्था के वर्षां में होता है। इस समय व्यक्ति को इन प्रश्नों का सामना करना पड़ता है कि वो कौन है? किसके संबंधित है? और उनका जीवन कहां जा रहा है? किशोरों को बहुत सारी नई भूमिकाएं और वयस्क स्थितियों का सामना करना पड़ता है जैसे व्यावसायिक और रोमेंटिक। उदाहरण के लिए अभिभावकों को किशोरों की उन विभिन्न भूमिकाओं और एक ही भूमिका के विभिन्न भागों का पता लग सकता है, जिनका वह जीवन में पालन कर सकता है। यदि इसके सकारात्मक रास्ते पता लगाने का मौका न मिले तब, पहचान भ्रान्ति की स्थिति हो जाती है
 

6. घनिष्ठता बनाम अलगाव-

समय  : 18 से 35 वर्ष
यह आरम्भिक वयस्क अवस्था/ युवावस्था की अवस्था होती है। इस अवस्था में व्यक्ति दूसरों के साथ धनात्मक संबंध (Positive Relation) बनाता है। सब व्यक्ति में दूसरों के साथ घनिष्ठता का भाव विकसित होता है, तो वह दूसरों के लिए अपने आपको समर्पित कर लेता है और जब दूसरों के साथ घनिष्ठता विकसित नहीं कर पाते हैं, तो वे सामाजिक रूप से अलग (Socially Isolated) हो जाते हैं. अर्थात् इस अवस्था में घनिष्ठता बनाम अलगाव का संघर्ष होता है।

7. सृजनात्मकता/ जननात्मकता बनाम् स्थिरता (Generativist vs Stagnation)-

समय  : 35 से 65 वर्ष
यह अवस्था मध्यवयस्कावस्था (Middle Adulthood) भी कहलाती । इस अवस्था में व्यक्ति अगली पीढ़ी के लोगों के कल्याण तथा उस समाज के लिए जननात्मक में उत्पादकता सम्मिलित करता है, लेकिन जब व्यक्ति को जननात्मकता की चिंता उत्पन्न नहीं होती, तो उसमें स्थिरता उत्पन्न हो जाती है।

8 अहं संपूर्णता बनाम् नैराश्य/ सम्पूर्णता बनाम् हताशा (Ego Integrity vs Despair)-

समय  : 65 वर्ष के बाद
इस अवस्था में 65 वर्ष के बाद से प्रारम्भ होकर मृत्यु तक की अवधि सम्मिलित होती है, इसे बुढ़ापा की अवस्था कहा जाता है। इस अवस्था में व्यक्ति अपने पहले के समय को याद करता है, कि उसने सभी अवस्थाओं की जिम्मेदारी धनात्मक रूप से पूर्ण की है या नहीं। अगर परिणाम धनात्मक होता है, तो संपूर्णता का भाव विकसित होता है और अगर परिणाम ऋणात्मक होता है, तो नैराश्य का भाव होता है |

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