कोहलबर्ग का नैतिक विकास सिद्धांत – kohalberg ka naitik vikas sidhant

kohalberg ka naitik vikas sidhant, कोह्लबर्ग के अनुसार नैतिक विकास के कितने स्तर होते ? नैतिक विकास का अर्थ क्या है? नैतिकता का स्वाभाविक प्रारंभ कब होता है? कोहलबर्ग ने कौन सा सिद्धांत दिया? कोहलबर्ग का सिद्धांत पीडीएफ डाउनलोड आदि के बारे में इस पोस्ट के अन्दर विस्तार से बताया गया है |
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कोहलबर्ग का नैतिक विकास सिद्धांत

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कोहलबर्ग का नैतिक विकास सिद्धांत kohalberg ka naitik vikas sidhant

  • अमेरिकन मनोवैज्ञानिक कोहलबर्ग (1927-1987) ने ही 1958 में नैतिक विकास का सिद्धांत प्रतिपादित किया।
  • इन्होंने नैतिकता के विकास को सिद्ध करने के लिए नैतिकता की 11 कहानियाँ ली थी।
  • कोहलबर्ग इन्हीं कहानियों को बच्चों को सुनाकर नैतिकता के स्तर को मापते थे।
  • इन कहानियों में से सबसे प्रसिद्ध हाइनज (हिंज/ Heinz) की कहानी प्रसिद्ध है। इन्होंने 20 वर्ष तक बच्चों के साथ साक्षात्कार कर (कहानी सुनाकर बच्चों से प्रश्न पूछना) निर्णय निकाला व यह नैतिक विकास का सिद्धांत दिया।
  • इस सिद्धांत में कोहलबर्ग ने नैतिक विकास के सिद्धांत (Principle of Moral Development) की कुल छः अवस्थाएँ बताई तथा इन अवस्थाओं को तीन स्तरों में बाँटा हैं

(1) प्री-कनवेशनल स्टेज/ पूर्व पारम्परिक/ पूर्व परम्परागत अवस्था (Pre Conventional Stage)- kohalberg ka naitik vikas sidhant

👉 समय : शैशव अवस्था/ 4 से 10 वर्ष 
इस अवस्था में बालक में नैतिकता का अभाव होता है परन्तु बालक का नैतिक विकास प्रारम्भ हो जाता है तथा बालक अपने परिवार के वयस्क सदस्यों से नैतिकता की बातें सीखता है। वह जैसा देखता है वैसा ही सीखता है अर्थात् बाह्य घटना के आधार पर ही वह सही व गलत बताता है। बालक में तर्क एवं चिंतन का आधार बाहरी घटना होती है। इस स्तर की दो अवस्थाएँ है

(i) आज्ञा एवं दण्ड की अवस्था (Stage of Order and Punishment)-

इस अवस्था में बालक आज्ञा इसलिए मानता है कि उसे दण्ड ना मिल जाए।

(ii) अहंकार की अवस्था/ साधनात्मक सापेक्षवादी उन्मुखता (Stage of Ego/ Instrumental Relativist Orientation) 

इस अवस्था में बालक में अहम् का भाव रहता है।

(2) कनवेशनल स्टेज/ पारम्परिक/ परम्परागत अवस्था (Conventional Stage) 

👉 समय :  बाल्य अवस्था/ 10 से 13 वर्ष
इस अवस्था में बालक का सर्वाधिक नैतिक विकास होता है। इस अवस्था में बालक अपने समाज, धर्म, राष्ट्र एवं संस्कृति के आधार पर एवं इनके द्वारा बताये नैतिक मूल्यों के आधार पर नैतिकता का विकास करता है। इस अवस्था की भी दो अवस्थाएँ मानी है

(i) प्रशंसा की अवस्था/ उत्तम लड़का अच्छी लड़की अवस्था (Stage of Appreciation/ Good Boy Nice Girl Orientation)-

इस अवस्था में बालक प्रशंसा पाना चाहता है।

(ii) सामाजिक व्यवस्था के प्रति सम्मान की अवस्था (Stage of Respect towards Social System)-

बालक समाज द्वारा निर्धारित व्यवस्थाओं तथा नियमों के प्रति सम्मान रखता है।

(3) पोस्ट-कनवेशनल स्टेज/ उत्तर पारम्परिक अवस्था (Post Conventional Stage) 

👉 समय : किशोर अवस्था / 13 वर्ष के बाद
इस अवस्था में बालक का नैतिक विकास लगभग पूर्ण एवं बालक नैतिकता के लिए आत्मनिर्भर बन जाता है। इसके बाद बालक स्वयं नैतिक मूल्यों का निर्धारण करता है। इस अवस्था में भी दो अवस्थाएँ शामिल है

(i) सामाजिक समझौते की अवस्था (Stage of Social Compromise)-

बालक को कई परिस्थितियों में समाज से समझौता करना पड़ता है।

(ii) विवेक की अवस्था/ सार्वत्रिक नीति परक सिद्धांत उन्मुखता (Stage of Conscience/ Universal ethical principle orientation)-

इस अवस्था में अपने नैतिक नियमों को प्रोत्साहित करने एवं आत्मनिंदा से बचने का अभिप्रेरण अधिक होता है। यह अवस्था उच्चतम सामाजिक स्तर की उच्चतम अवस्था होती है। इस अवस्था के अंतर्गत किशोरों में सार्वत्रिक नैतिक नियम की नैतिकता विद्यमान रहती है।

 

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